राजसमंद की देसी राबड़ी बनी सेहत और परंपरा की पहचान

राजसमंद। आधुनिक दौर में जहां घरों में फास्ट फूड का चलन तेजी से बढ़ता जा रहा है, वहीं राजस्थान के राजसमंद जिले के ग्रामीण अंचलों में आज भी परंपरा और देसी स्वाद की खुशबू बरकरार है। गांवों में छाछ और मोटे अनाज से बनने वाली देसी राबड़ी केवल एक पारंपरिक भोजन नहीं, बल्कि ग्रामीण संस्कृति, मेहनतकश जीवनशैली और बेहतर स्वास्थ्य का प्रतीक मानी जाती है।

छाछ और मोटे अनाज के दलिये से तैयार होने वाली यह पारंपरिक राबड़ी पौष्टिक तत्वों से भरपूर होती है। इसे बाजरा, मक्का, गेहूं और जौ जैसे मोटे अनाज के दलिये को छाछ में मिलाकर धीमी आंच पर पकाकर बनाया जाता है। कई ग्रामीण इलाकों में आज भी इसे मिट्टी के चूल्हे पर घंटों तक पकाया जाता है, जिससे इसमें मिट्टी की सौंधी खुशबू और देसी स्वाद घुल जाता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में सुबह और दोपहर के भोजन में राबड़ी का विशेष महत्व माना जाता है। किसान और मजदूर वर्ग इसे ऊर्जा देने वाला पारंपरिक आहार मानते हैं। खासतौर पर गर्मियों के मौसम में यह शरीर को ठंडक पहुंचाने के साथ लंबे समय तक ऊर्जा बनाए रखने में मदद करती है।

ग्रामीण बुजुर्गों का मानना है कि राबड़ी न सिर्फ शरीर को पोषण देती है बल्कि पाचन तंत्र को भी मजबूत करती है। हालांकि बदलती जीवनशैली और फास्ट फूड संस्कृति के बढ़ते प्रभाव के कारण गांवों में भी इसका प्रचलन धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। इसके बावजूद ग्रामीण परिवार इस परंपरा को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए बच्चों को इसकी पारंपरिक विधि सिखा रहे हैं।

देसी राबड़ी आज भी ग्रामीण जीवन की पहचान और स्वास्थ्यवर्धक भोजन की एक अमूल्य विरासत मानी जाती है।

Written By

Chanchal Rathore

Desk Reporter

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